बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

मरासिम



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(Pic By: sakhorn38)











"आसमान में देखा है
वो कमर" ................... !!

"हुं" ..................... !!

"कितना भोला दिखता है न
श्वेत, सुन्दर, शीतल" ........... !!

"हुं" ..................... !!

"इसके आते ही क्यूँ
मन में वेग होता है" ................ !!

"उन्न" .............. !!

"ये पूरा होता है तो
क्यों मुझमें उन्माद आता है" ............ !!

"क्या कहते हो
तुमको भी
मैं तो चुप ही थी
पता नहीं तुम क्या सोचोगे" ................ !!


"कहती तो, कभी अपनें मन की बात
क्यों न बनती हो तुम, मरासिम" ................ !!

"मैं, मरासिम".................... ??

"हाँ ! मरासिम !
श्वेत, सुन्दर, शीतल" ................ !!

"ओफ, ओ "...............!!

"अंतर है थोड़ा सा बस
आसमान के और मेरे मरासिम में " ............ !!

"हुं, हुं " ....................... !!

"तुम्हारी धवल चाँदनी में
मन रुकता है, उद्वेग थमता है" .............. !!

"बाप रे" ....................... !!

"वो देखो, इस नदी की लहरों को
कल - कल, कुल - कुल कर बलखाती
तुमको ही तो देख रही हैं" ........................... !!

"......................."

"मैं हूँ, नदी है, तुम हो:
और है दूर, वो सुनहरा चाँद
कितना शांत है सब
शीतल ! निर्मल ! तुम से ..................... !!

"चलो ना, अब चलते हैं
अन्धेरा भी आ गया है
नरभक्षी अब निकलेंगे
हम कैसे पहचानेंगे
आदमी की खाल पहन
हमसे, तुमसे ही
दिखते हैं
चलो ना, अब चलते हैं" ......... !!


"ह्म्म्मम्म
काश ! होती धवल चाँदनी
इस धरती पर, तुमसी
मरासिम" ...................................... !!

उत्पल कान्त मिश्र
मुंबई, १५:१२
१९/११/२०११

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

भूख लगी है साहेब .......... !!



















जानता हूँ
कितने विद्वान और
कितने विकसित हैं आप
और जानता हूँ
कितनें उदार ह्रदय
कितनें विकासशील हैं
आप और आपके विचार .......... !!

कृतार्थ हूँ
आपकी दानशीलता का !
आपका हमारी हालत पे
चिंताग्रस्त होनें से
परेशान हूँ मैं
कि कहीं आपकी पेशानी पे
शिकन न आ जाये
दर्द होगा आपको
आदत नहीं है न
हम तो शिकन लेकर ही
पैदा हुए हैं, मरने को ............. !!

बड़ी अच्छी लगती हैं
आपकी बातें
जो बताती हैं
हम कैसे प्रगति करेंगे
पर क्या करें
अच्छी तो लगीं
समझ न आयीं
भूख जो लगी थी
कम्बख्त पेट को कहाँ पता था
आप हमारे हित कि सोच कर
परेशान हो रहे हैं .................. !!

हमें ये भी कहाँ पता था, साहेब
कि, बुद्धि भी पेट के बाद
काम करती है
बस भूख लगी है साहेब .......... !!

हम कृतार्थ हैं ........................ !!

उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"
मुंबई

शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

जज्बे



http://www.freedigitalphotos.net/images/view_photog.php?photogid=172 (Pic By: Maggie Smith)
















घर की छत पर खड़े
सर्दियों की धूप सेंकते
सिगरेटे के छल्लों में
दिल का गुबार खोजते
आती - जाती गाड़ियों को
देखता, सोचता था मैं .................. !!

इस गुनगुनी धूप में
कैसी नरमी सी है
जो हड्डियों को सहलाती है
जैसे माँ का आँचल हो
जो दिल को सहलाता था

अचानक याद आई
वो सारी बातें
माँ की गोद, गाँव की हरियाली
और दूसरी सिगरेटे जलाते हुए
देखनें लगा मैं,
कंक्रीट का जंगल
दिल के गुबार नें कहा
कहाँ गया वो दिल
जो बसता था
हर गली, हर जज्बे में
यहाँ तो दिलों में भी
कंक्रीट का जंगल है

चाय की चुस्की से
व्हिस्की की बोतल तक
खोजता रहा दिल का सकून
और दिल को बहलाने को आखिर
खड़ा हो गया मैं
छत की धूप में
और देखनें लगा
आती - जाती गाड़ियाँ

होठों पे दबा सिगरेटे
और मुंह से निकलता धुआं ............... !!

उत्पल कान्त मिश्र
मुंबई



मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

दिल की बात मैं यहाँ करता हूँ ......... !!


http://www.freedigitalphotos.net/images/view_photog.php?photogid=1256 (Picture By Evgeni Dinev)















लो फिर आज इक ग़ज़ल कहता हूँ
उनकी बात इक दफ़े सुनता हूँ ........... !!

है ये रात फिर बड़ी सी लेकिन
ख़स - ओ - ख़ाक* मैं लिए चलता हूँ .... !!

मैं चुप - चाप ही चला हूँ अबतक
पिन्हा* दर्द को लिए फिरता हूँ ............. !!

हैं बाज़ार में खड़े बन - ठन के
उनके हाल को समझ रोता हूँ ............... !!

देखो तुम कि हो ब'ह़र - ओ - मिसरे*
दिल की बात मैं यहाँ करता हूँ ......... !!

उफ़ ! इस चाँद की ख़लिश को सहना
अपने हाल पे बहुत हंसता हूँ ........... !!

रहने दो कि ढल गयी जां "नादाँ"
बाकी अब न कुछ चलो सोता हूँ ............ !!

उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"
मुंबई, अक्टूबर ४, २०११

* ख़स - ओ - ख़ाक: धूल और राख
पिन्हा: छुपा हुआ
ब'ह़र - ओ - मिसरे: ग़ज़ल का मीटर और उसमें बंधे शेर

रविवार, 2 अक्टूबर 2011

चलो, कुछ लिखते हैं



Image: photostock / FreeDigitalPhotos.net
















चलो, काग़ज़ – कलम निकालो
कुछ लिखना है
सदियों से लिखी जा रही है
बातें ……….
हम भी लिखते हैं
कागज़ घिसते हैं
कटने दो पेड़ों को
पढनें दो लोगों को
फिर वो कलम उठाएंगे
चश्मे संभालेंगे
और
लग जायेंगे
समीक्षा में , विवेचना में
त्रुटियाँ निकाली जायेंगी
शब्द खोजे जायेंगे
काव्य की हर वो धारा
जो लेखनी में नहीं
वो सब निकाले जायेंगे
बहस होगी , इस्सिलाह होंगे
सब होगा
बस बातें गुम हो जायेंगी

चलो , काग़ज़ – कलम निकालो
कुछ लिखते हैं …………… !!



उत्पल कान्त मिश्र
मुंबई , सितम्बर १९ , २०११

शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

अजीब शख्श था













अजीब शख्श था
बाल बिखरे
बढ़ी दाढ़ी
और उनसे झांकते चंद सफ़ेद बाल
धूल सनें कपडे
धंसी हुई आंखें
और उनसे झांकते बिखरे ख्वाब !!

अजीब शख्श था
मिट्टी कुरेदता
देखता , सोचता
जैसे अपना अस्तित्व ढूंढता हो
खाली आँखों से
आसमान को ताकता
जैसे सूरज से कुछ पूछ रहा हो !!

अजीब शख्श था
हंसता भी था
रोता भी था
आती जाती गाड़ियों से बेखबर
पेशानी पे भाव
कई तरह के
और चेहरा सपाट , भाव हीन !!

अजीब शख्श था
मैं रुक गया
और पूछने गया
कहनें लगा, चीथरे ढूंढता हूँ
अपनें बच्चों के
और अपनें बचपन के
यहीं कहीं थे
और फिर कुरेदने लगा मिट्टी !!

अजीब शख्श था ........................... !!

उत्पल कान्त मिश्र
३०/०९/२०११ , मुंबई

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

कल्पना

मिलन धरा का आसमान से

मानो हो रहा हो क्षितिज पर

चुम्बन लेती जब वासंती बयार

अलिकुल ले उड़ते हैं सन्देश

सावन को कहते गाओ राग मल्हार

कितनी मनोरम है ये धरती

दुःख को ढंकती, सुख से छाती

प्राणों की स्निग्ध थाती .......... !!


उत्पल कान्त मिश्र

दिल्ली ; १७.०२.२००९

१५:५८

शुक्रवार, 15 अगस्त 2008

दास्ताँ - ऐ - जीस्त





Image: think4photop / FreeDigitalPhotos.net










कोई गाँव जलाता है किसी का दिल दहलता है
हयुले में हर एक लेकिन खुदा का नूर लगता है !!!

जमीन पर जो भी आएगा कभी आंसू बहायेगा
जफ़र - ओ - कातिलों में भी मचलता दिल धड़कता है !!!

अजब सी है कहानी ये कहाँ पे ले के जाती है
वहीँ पर जिंदगानी है जहाँ सपना उजड़ता है !!!

तुझे हो क्यों पता "नादां" बशर के दर्द हैं कितनें
कहीं पर चाँद होता है कहीं सूरज निकलता है !!!

उत्पल कान्त मिश्रा "नादां"
अगस्त १४; २००८
२०:२२



मंगलवार, 5 अगस्त 2008

मेरी प्रियतमा को समर्पित


















प्रियतमे !!!!


प्रियतमे !!!!
याद है मुझको, हर वो पल
जब तुम थी , न थी , न हो
फिरभी तुम मेरा जीवन थी , है , हो ....... !!!!




याद है मुझको , हर वो पल
जब रश्मिरथी की प्रथम किरणों संग
तेरी बोझल पलकों को अपलक देखा करता था
और कोकिला वाणी को सुन प्रमादित होता था
पुलकित ह्रदय ले इस प्राकृत सरोवर का
कलरव का , नियति तांडव का , मैं कृतार्थ होता था ...... !!!!


याद है मुझको , हर वो पल
जब ह्रदय व्यथित ले , शीथल पथिक सा
में भवन आता था , तेरे अंचल को पाता
और स्वर्ण रेखाओं सम भविष्य का
ताना बाना बुन स्वस्थ मन ले सो पता था
और उषा की किरणों के आते यह पथिक फिर
उस अनिश्चित पथ पर युद्ध करनें जाता था .......... !!!!



याद है मुझको , हर वो पल
तेरा मुस्काना , जैसे मेरा जीवन
तेरा इठलाना , जैसे मेरी कल्पना
तेरा गुस्साना , जैसे मेरा काल ग्रास
तेरा रूठना , जैसे कुहरे की धूप
और तेरा मान जाना , मोक्ष सम ...... !!!!



याद है मुझको , हर वो पल
मानो कलि की कालिका
बिछा रही हो हो माया जाल
और चारा सा तेरा अल्हर्पण
मोह पाश में दिग्भ्रमित हुआ सा
उस पथ को जाता था
जहाँ निशा ही दिवा हुई हो
और दिवा है चिर निःशब्द
याद है मुझको , हर वो पल
वो दावानल लील रहा था
मेरे जीवन का जीवन ......... !!!!



याद है मुझको, हर वो पल
वो तेरा मुस्काना, इठलाना,
गुस्साना, रूठना और मान जाना
वो मेरा जीवन था , है , होगा ...... !!!!




याद है मुझको , हर वो पल
और आश लिए नव सूर्य
हर प्रातः मैं देखा करता हूँ ..... !!!!




उत्पल कान्त मिश्र "नादां"
दिल्ली , अगस्त ४ ; 2००८
१७:५७