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शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

जीवन - तृष्णा






जीवन तृष्णा उमड़ - घुमड़ मन पे बरसे

सत्व सिमट कर तन चेतन को हर ले
तृष्णा बन मृगतृष्णा री मुझको ही हर ले
जीवन तेरी - व्यथा कथा सब मुझसे सुन ले !!
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कैसा बीज धरा रे तुने इस घन बन में
मरीचिका बन ये मरुस्थल इसको हर ले 
इंगला - पिंगला और कमल सब बंधन में ले
माया बन हंस कह मुझको खुद में ले ले !!
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मात्र भाव से हाथ पकड़ कंटक में छोड़े 
पित्र भाव से कह संकट से तू युद्ध कर ले 
मृदु भाव से सब अभाव सम्मुख भी कर दे
शनैः - शनैः इस बलशाली का बल सब ले ले !!
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किन्तु हा ! ये तृष्णा हर पल बढती जाए
सुरसा सा मुख खोले हनुमान हरती जाए
राम - सखा कोई खुद को कैसे इतना कर ले
जीवन तेरी - व्यथा कथा सब मुझसे सुन ले !!
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उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"

बुधवार, 12 नवंबर 2014

नव जीवन प्रारूप





आज काफी अरसे के बाद अछाँदसिक कविता गहने की चेष्टा की है ! इस कविता के हर छंद का स्वरुप व प्रारूप भिन्न है ! आप पाठकों से नम्र  निवेदन है कि अपनी प्रतिक्रिया देकर अपने अनुभव से मुझे अवगत करायें ! प्राथनीय ……।

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले 
सुनकर ऐसी मीठी बातें, वह डोले है 
साँसों की यह कथा निराली, अंग हो ले !

साँझ सवेरे सपने देखे 
दिन अच्छे आएंगे रे 
लेकर बैठा पथरायी आँखें 
कथा सुनायी, अब सो ले रे ! 

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !

सूखे खेत, महाजन नाचे 
फटी रजाई, ओढ़ ले भाई 
राजा सब की भोज सजी है 
तू भूखी सो ले रे माई !

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !

परदेसी बेटा क्या बोले 
उसकी तो है अलग लड़ाई 
एक चाकरी के चक्कर में 
अपनी रोटी, जमीन गँवाई ! 

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !

प्रेम भाव सब उलझ गया है 
रिश्तों के अद्भुत गोले में 
समझ, समझ कर हम इतना हैं समझे 
गुम  हुए सारे सिरे उलझे गोले में !

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !

इन्सान कहाँ ? हम भीड़ हैं साहेब !
हाँकों लाठी से, न बने, तो मारो गोली  
महल बना लो हम लाशों की ढेरों पे 
मरघट के राजा बन, अरे तुम शान करो साहेब ! 

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !


थमा  हुआ है सारा जीवन गलियारों में  
देख निराली सत्ता की यह नयी लड़ाई 
बंधा पड़ा समाज यहाँ सरकारी कागज़ में 
जीवन अपना ! उठो, लड़ो और ले लो भाई !

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !


मजबूरी है, 
चाकरी है, 
घर की चिंता भी है,
कमजोरी की समझ बड़ी है 
ताकत उनकी बहुत बड़ी है 
इंसानों की फौज खड़ी  है 
हथियारों से धौंस जमी है 
जमीं - जमीर की लूट मची है  
जो सबका था अब उनका है  
हम समझ रहे थे, समझ रहे हैं 
मजबूरी है, इसकी अपनी भाषा है 
न गीत नया न बोल नए हैं 
हम पवन नहीं और पेड़ नहीं हैं !

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !

बदली थी. बदली है, बदलेगी धरती 
चक्रवात बन पवन पेड़ों को ले जाएगा 
वह आएगा, इक नल्हत  की आवाज़ उठेगी 
जय  भारती, जय  भारती, जय  भारती !

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
देख निराले खेल, चलो हम बहते हैं !!!!

उत्पल कांत मिश्र  "नादाँ"
१२.११. २०१४ 
१५:१६  

गुरुवार, 6 नवंबर 2014

मन कहीं और, तन कहीं और !!






मन  है कहीं और, कि तन कहीं और       
व्यथा नयी है क्या यह भाई ?
कि बंधन में  तो सब जकड़े हैं                    
भली  बंधन से  रीत निभायी !   

    
नदी चले तो  बंधन ना ले  
पक्षी उड़ें  तो मुक्त हो भाई !
पवन चले तो बंधन ले क्या?
कि तुमने  मरकर उमर बितायी!   

तुम कहे घुटता मैं बस मैं  हूँ 
दी ख़ुशी सबको ,कैसे भाई ?   
दुःख तेरा, ठीक,  जीवन क्या है?
रीत भली क्या कि अगन लगाई ? 


भला ऐसे हो, तब अच्छे हो
कि  मैं कहता हूँ, सुन लो भाई !
हाँ ! सुनी मैनें, तुम भी समझो  
कथा भली न जो चलती आयी  !

उत्पल कांत मिश्र "नादाँ " 
नवम्बर ६, २०१४;२३:२६ 

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

साजन मोहे पीहर छोड़े चले हैं बिदेस री ....... !!

साजन मोहे पीहर छोड़े चले हैं बिदेस री
सासू रोवे आंसू पोछें, बोले न कछु और री ...... !!

बादर अईहें सावन - भादो करिबो का हम खेल री
अँखियाँ झर - झर अबहीं बरसें, समझें नहीं पीर री ........ !!

रोवत - रोवत अँखियाँ सूजीं, कहैं ना मैं सोयी री
बैरी निंदिया, साजन संग ही, गयी हें बिदेस री ..... !!

चूड़ी - बिंदिया भावे नाहीं लगे सब बिदेह री
कहे पहरूं सोना – चांदी, देखिहें हमका कौन री ....... !!

गाभिन गइया बछिया दीहें ननद कहे देख री
हे पीर अपनी कासे बोलूँ, सखी न संदेस री ....... !!

बाबुल मोसे अँखियाँ मीचें बड़े सब निर्मोह री
बोलो मइया हमका भेजें पिया घर बिदेस री ........ !!

उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"
मुंबई