शिव के मस्तक शव की धूली ये धरा श्मशान है / खेलो रे खेलो रंगों की होरी ये धरा श्मशान है ...!!
शुक्रवार, 27 जुलाई 2018
फलसफे ... !!
शुक्रवार, 20 जुलाई 2018
बन्दे .... !!
बुधवार, 3 मई 2017
क्षणिका - हलफ़नामा
मंगलवार, 10 जनवरी 2017
मेरी नदी
जीवन की उत्ताल तरंगें
बहती हरदम उठ – गिर करके
इस तट पर मैं मेरा बैठा
उस तट पर है निर्वाण खड़ा !!
यह तट है इह जीवन मेरा
है उस तट पर ये ध्यान टिका
भाव समंद की लहरों पर मैं
हूँ तरता नित इक नाव बना !!
कल – कल नदिया कहती मुझसे
मैल न दे तू मल सा मुझमें
पालन – तारण सब मैं तेरा
उस तट की नैया ये लहरें !!
जन – मन, संगी – साथी सारे
संग रहते हैं, बन से मन में
दूजा जाने! ये भंवर है
बसता तेरा राम सकल में !!
वह तट ही है तेरा जिसमें
पग ये हों तेरे धीर धरे
पीर पराई जाने जब तू
इस तट खुद तर आयेगा रे !!
इस तट खुद तर आयेगा रे !!
उत्पल कान्त मिश्र “नादां’”
मुंबई
जनवरी १०, २०१७
बुधवार, 28 दिसंबर 2016
मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016
मंगलवार, 26 जुलाई 2016
अरी बावरी नयना ताके
सोमवार, 25 जनवरी 2016
तेरी कहानी .... तेरी जुबानी
मंगलवार, 26 मई 2015
कैसी कैसी बातें ले हम बैठे
बुधवार, 12 नवंबर 2014
नव जीवन प्रारूप
गुरुवार, 6 नवंबर 2014
मन कहीं और, तन कहीं और !!
शुक्रवार, 6 जून 2014
अजी सोचिये क्या ग़जब हो गया है
बुधवार, 19 मार्च 2014
हमने पी है अभी है शराब बाकी
मंगलवार, 26 मार्च 2013
रंगरेज
सोमवार, 9 जनवरी 2012
अब्र ढल जाए है हरदम , यादों आया ना करो..... !!

(Pic From Google)
उम्र हो जायेगी दुस्तर वक़्त आने से पहले
शाख ढल जायेगी फूलों के सोने से पहले ………… !!
बंद हो जाये गर आंखें तो जानो बस ये तुम
कि चुप हो गयी हैं ये अब रोने से पहले ……………….. !!
अब्र ढल जाए है हरदम , यादों आया ना करो
कर लूं प्यार मैं तुझको फिर खोने से पहले ………… !!
क़त्ल मैने किया अबके, वो था अपना कब से
जश्न इक और हो यारों , खूँ धोने से पहले …………….. !!
ये ख़म – ओ – गुमाँ “नादाँ” लगते अच्छे कितनें
सब को यूँ लगा तेरे यां होने से पहले ………………….. !!
उत्पल कान्त मिश्र “नादाँ”
सोमवार, 12 दिसंबर 2011
ख्वाब

(Pic by my elder brother: Pranav Mishra)
मेरे घर के पीछे
कभी सूरज निकलता था
चहचहाती थी चिड़िया, और
महकता बाग़ होता था ........... !!
**
भगत को भजते - गाते लोग
जाते थे गंगा तट की ओर
बजते थे मंदिरों में ढोल
ऐसे को कहते थे कभी भोर
**
शाम को घर में सबका होना
बाबूजी संग चाय और चबेना
रात को काली मंदिर जाना
अजब से इक सुकून का होना
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शहर में बाग़ होते थे
आम के मंजर महकते थे
कभी कोयल भी गाती थी
बिना डर लोग टहलते थे
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बड़ी छोटी थी दुनिया तब
जाने पहचाने से थे सब
दलानों पर की मज्लिशैं
न होती थी दीवाली कब
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ये कैसी नींद है आयी
ये कैसा ख्वाब है आया
जगा दो कोई मुझको भाई
सुबह है फिर से जो आयी
उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"
मुंबई
मंगलवार, 15 नवंबर 2011
साजन मोहे पीहर छोड़े चले हैं बिदेस री ....... !!
सासू रोवे आंसू पोछें, बोले न कछु और री ...... !!
बादर अईहें सावन - भादो करिबो का हम खेल री
अँखियाँ झर - झर अबहीं बरसें, समझें नहीं पीर री ........ !!
रोवत - रोवत अँखियाँ सूजीं, कहैं ना मैं सोयी री
बैरी निंदिया, साजन संग ही, गयी हें बिदेस री ..... !!
चूड़ी - बिंदिया भावे नाहीं लगे सब बिदेह री
कहे पहरूं सोना – चांदी, देखिहें हमका कौन री ....... !!
गाभिन गइया बछिया दीहें ननद कहे देख री
हे पीर अपनी कासे बोलूँ, सखी न संदेस री ....... !!
बाबुल मोसे अँखियाँ मीचें बड़े सब निर्मोह री
बोलो मइया हमका भेजें पिया घर बिदेस री ........ !!
उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"
मुंबई
शनिवार, 12 नवंबर 2011
बेसबब खुद को लुटाया न करो ....... !!

दर्द आँखों से बहाया न करो
कीमती खूँ यूँ गवाया न करो .......... !!
क्यों जमाने से खफ़ा हो फिरना
बेसबब खुद को लुटाया न करो ....... !!
बेकसी ले के करो ये न सफ़र
जिंदगी तुम यूँ मिटाया न करो ........ !!
मुस्कुराने की अदा यूँ रखो
लाख हों ग़म पर दिखाया न करो ..... !!
ये पराया है जहाँ सुन "नादाँ"
जान लो पर ये सुनाया न करो ........ !!
उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"
मुंबई
शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011
यूँ कि बस पीता चला ग़ालिब सहर तक

(Pic by my elder brother; Pranav Mishra)
यूँ कि बस पीता चला ग़ालिब सहर* तक
तिश्नकामी* ही मिली फिर सर - बसर तक ...... !!!
देखिये सब है रवायत - ओ - अनासिर*
नींद में ही कट चली मंजिल शहर तक .......... !!!
पेंच - ओ - ख़म*, हुस्न , उल्फत और मुहब्बत
जुल्फ यह अपनी न यूँ झटको कमर तक ....... !!!
है तिरा हुस्न - ऐ - रफी* जलवाफरोशी
सर झुकाया क्या मिला दीन - ओ - जबर* तक ..... !!!
सुन उफक* में यूँ न इतरा इस शहर में
इक सफर है ये ज़फर से ले ज़रर* तक ............ !!!
ढल रही होगी कहीं मय तजकिरा* में
साक़िया क्या साथ देगी यूँ उमर तक ............. !!!
खोजता हूँ इस जहाँ में पाक रिश्ता
डब - डबाती ही रही आंखें बसर* तक .............. !!!
इक खुशी है मर गई तो क्या नया है
आसमां भी घट रहा है उस कमर* तक .......... !!!
ख़ाक के पुतले सभी हैं पैकरों* में
राख ही होंगे यहाँ अफरात - जर* तक ........... !!!
था बड़ा वाइज़* बना तू होश अब कर
कैफियत रख बस कि "नादां" पी नज़र तक ..... !!!
उत्पल कान्त मिश्र "नादां"
दिल्ली
* सहर: तक
तिश्नकामी: प्यास
रवायत - ओ - अनासिर: जिंदगी के नियम
पेंच - ओ - ख़म: अदाएँ
हुस्न - ऐ - रफी: चढ़ता हुआ हुस्न
दीन - ओ - जबर: राजा और रंक
उफक: शिखर (जीवन कि बुलंदियाँ)
ज़रर: कमजोरी
तजकिरा: चर्चा
बसर: उम्र
कमर: चाँद
पैकरों: शरीर
अफरात - जर: सोने जवाहरात
वाइज़: विद्वान्
YuuN ke bas peetaa chalaa Ghalib sahar तक
tishNakaamii hi mili phir sar – b – sar tak ………!!
dekhiye sab hai rawaayat – o – anaasir
neeNd main hi kat chalii manzil shahar tak ……… !!
pench – o – kam, husn, ulfat aur muhabbat
julf yah apni Na jhatko kamar tak ………………… !!
hai teraa husn – e – rafii jalwaafaroshii
sar jhukaayaa kyaa milaa deen – o – zabar tak ……!!
sun ufaq main yuun naa itraa is shahar main
ik safar hai ye zafar se le zarar tak ……………….!!
dhal rahi hogii kahin may tazkiraa main
saakiyaa kyaa saath degii yuun umar tak …………!!
khojtaa hoon is jahaN maiN paak rishtaa
dab – dabatii hii rahii aankhaiN basar tak ………… !!
ik khushii hai mar gayii to kyaa nayaa hai
aasmaaN bhi ghat raha hai us qmar tak …………… !!
khaak ke putle sabhii haiN paikaroN main
raakh hi honge yahaN afraat – Zar tak ……………!!
thaa badaa waaiz banaa tu hosh ab kar
kaifiyat rakh bas ke “NadaaN” pee nazar tak ……… !!
Utpal Kant Mishra “NadaaN”
Delhi .













