हसरत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हसरत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

क्या माँगूँ मैं हाथ पसारी ?




उद्बुद्ध करते तिमिर प्रकाश में 
अनगिन वैचारिक श्रृंखलाएँ 
यह उद्वेलन शीतल जो कर दे
वह दैदीप्य कहाँ से लायें ll  

ज्ञान समंद में उबडुब अज्ञानी 
भँवर पार कर ओ अवहारी 
बिन गुरु ज्ञान होत  नहीं तारी  
कि  क्या  माँगूँ मैं हाथ पसारी ?

…… उत्पल कांत मिश्र "नादाँ" 

शुक्रवार, 30 मई 2014

दग्ध





"दैदीप्यमान सूर्य" ! तुम्हें देखकर न जाने कितनों  के मानस पटल  पर  कितने प्रकार के विचार आविर्भूत होते होंगे I 

………… "मुंडे - मुंडे मतिर्भिनाः" I 

किन्तु एक बात अखंड है I जिसने भी तुम्हें देखा उसके मानस ने उससे कहा -
"शाक्ति " I  हाँ शक्ति  अभिव्यंजना ही  तो है तू I 

………… "अग्नि, दाह , पोषक , विनाशक  I "

किन्तु  "दैदीप्यमान सूर्य" !  जब भी मैनें तुम्हारी तरफ देखा ,  पता नहीं क्यूँ मुझे ऐसा लगा मानो एक अद्भुत , विलगित संकेत दे रहा है तू I  मानो  कह रहे हो मुझसे -

ऐ मानव ! 
क्या देखता है मेरी तरफ
किस निर्णय पे आना चाहता है  ?
उसपर,
जहाँ  अनेक मानव 
तुझसे पहले भी पहुंचे ?
किन्तु,
अर्द्ध सत्य है मात्र वह I 

हाँ ,
शक्तिशाली हूँ मैं 
अग्नि है मुझमें I 
भयभीत सब मुझसे
देखो I 
परिभ्रमण करते मेरे 
चहुँ दिश , निर्निमेष, निःशब्द 
यह समस्त ग्रह - समूह I 

हाँ !
शक्ति हूँ मैं 
परिक्रमा करते सब मेरी 
किन्तु,
दूर - दूर रह I 

इतनी दूर कि  मैं चाह  कर भी अपने अंतस का स्पंदन उन तक नहीं पहुँचा पाता I ऐ मानव ! कभी सोचा है , इतने अनुयाइयों के रहते हुए भी कितना अकेला हूँ मैं I  हाँ, आज मात्र एक अग्नि - पिंड बन कर रह गया हूँ मैं I 

मेरी यह शक्ति - मेरी अग्नि - मुझे कितनी तीव्रता से जला  रही है आज I 
शेष क्या मुझमें 
मात्र,
दहन I 

ऐ मानव ! 
काश.......
मेरे समीप आ 
कोई मुझसे कहे -
"ए  दैदीप्यमान सूर्य !
ऐ बंधु I 
बहुत जल चुका तू अकेला 
ला , अब बाँट लूँ  मैं 
तुझसे तेरा दाह  थोड़ा "I I 

ऐ मानव ! अब तू ही सोच , किस काम की मेरे मेरी यह शक्ति  ………… !!

उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ "
१९८६ 

बुधवार, 19 मार्च 2014

हमने पी है अभी है शराब बाकी





हमने पी है अभी है शराब बाकी 
होना क्या है हबीबों खराब बाकी …… !!

बादाकश (१)  हो उठाए सवाल ढेरों 
आना बस है हया का जबाब बाकी…… !!

लाया शीशा, मुसल्ला (२), कि साथ ए रब 
तेरा मेरा रहा ये हिसाब बाकी ……!!  

घमज़ाह (३), ज़ीनत (४), करिश्मा, यसार (५)  हैं 
जिस्म - ओ - जां सब, रहा क्या, तुराब (६) बाकी …!!

देखा सबने ख़जाना हिसाब करके 
मेरा बस है फ़टा इक जुराब बाकी …!!

यूं होता मैं कहानी जनाब प्यारी 
"नादाँ" होता, मगर है, सराब (७) बाकी …!! 

उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"
मार्च १९, २०१४ 
०२:५३ प्रातः  

(१) बादाकश: नशे में  धुत्त 
(२) मुसल्ला: नमाज़ पढ़ने की  चटाई  
(३) घमज़ाह: शोख़ी 
(४) ज़ीनत: खूबसूरती  
(५) यसार : ऐश्वर्य 
(६) तुराब: मिट्टी, धरती   
(७) सराब: भ्रम, मृगमरीचिका  

   

मंगलवार, 26 मार्च 2013

रंगरेज





ऐ रंगरेज 
आसमां में  इन्द्रधनुष की 
एक छवी सी देखी थी 
पुलकित मन फिर सोच रहा 
इन रंगों का क्या तू बाज़ीगर 
ऐ रंगरेज  !

देखो ! मुझमें भी हैं रंग 
पीत हुआ है मेरा बचपन 
जब माँ की लोरी सुनती हूँ 
और बाबू की  गोदी होती हूँ 
ऐ रंगरेज !

और है नीला मेरा अल्हड़पन 
जब मैं तितली सी उडती हूँ 
इत - उत दौड़ी भागी फिरती हूँ 
मैं दादी की नील परी  हूँ 
ऐ रंगरेज !

देख ! गुलाबी मेरा यौवन 
मैं खवाबों की अमराई हूँ 
उनकी आँखों को भायी  हूँ 
इस धरती की  लाल परी  हूँ 
ऐ रंगरेज !

ऐ रंगरेज 
पर मुझमें काला भी है 
जो तेरा धनुष  नहीं है 
इन बातों की बस पाती हूँ 
पर ये सब जीना चाहे हूँ 
ऐ रंगरेज !

ऐ रंगरेज 
हर लो ना मेरा कला रंग 
विनती कर मैं रोई हूँ 
मैं हरे को ललचाई  हूँ
दे दो ना ! मैं तेरे द्वारे आई हूँ 
ऐ रंगरेज !

ऐ रंगरेज 
बोलो ना .... !!
क्या जी लूं मैं फिर 
बचपन के वो बीते पल ?
ऐ रंगरेज ....... !!

........... उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ " 







सोमवार, 12 दिसंबर 2011

ख्वाब





(Pic by my elder brother: Pranav Mishra)









मेरे घर के पीछे
कभी सूरज निकलता था
चहचहाती थी चिड़िया, और
महकता बाग़ होता था ........... !!
**
भगत को भजते - गाते लोग
जाते थे गंगा तट की ओर
बजते थे मंदिरों में ढोल
ऐसे को कहते थे कभी भोर
**

शाम को घर में सबका होना
बाबूजी संग चाय और चबेना
रात को काली मंदिर जाना
अजब से इक सुकून का होना

**

शहर में बाग़ होते थे
आम के मंजर महकते थे
कभी कोयल भी गाती थी
बिना डर लोग टहलते थे

**

बड़ी छोटी थी दुनिया तब
जाने पहचाने से थे सब
दलानों पर की मज्लिशैं
न होती थी दीवाली कब

**

ये कैसी नींद है आयी
ये कैसा ख्वाब है आया
जगा दो कोई मुझको भाई
सुबह है फिर से जो आयी



उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"
मुंबई