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बुधवार, 18 जुलाई 2018

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

सूफ़ियाँ

(Pic from http://pixabay.com)



एक समंद है जीवन मेरा
लहरें बारम - बार !
उठना, गिरना, तरना, बहना
रुकना ना इस पार !! 

माई, अल्लाह, राम, श्याम
मौला, गुरुवर तेरा नाम ..... !! 


उत्पल कान्त मिश्र “नादां”
मुम्बई 
दिसम्बर २८, २०१६ 

(मेरे एक गीत का अंश) 

© Utpal Kant Mishra, 2016

शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

जीवन - तृष्णा






जीवन तृष्णा उमड़ - घुमड़ मन पे बरसे

सत्व सिमट कर तन चेतन को हर ले
तृष्णा बन मृगतृष्णा री मुझको ही हर ले
जीवन तेरी - व्यथा कथा सब मुझसे सुन ले !!
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कैसा बीज धरा रे तुने इस घन बन में
मरीचिका बन ये मरुस्थल इसको हर ले 
इंगला - पिंगला और कमल सब बंधन में ले
माया बन हंस कह मुझको खुद में ले ले !!
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मात्र भाव से हाथ पकड़ कंटक में छोड़े 
पित्र भाव से कह संकट से तू युद्ध कर ले 
मृदु भाव से सब अभाव सम्मुख भी कर दे
शनैः - शनैः इस बलशाली का बल सब ले ले !!
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किन्तु हा ! ये तृष्णा हर पल बढती जाए
सुरसा सा मुख खोले हनुमान हरती जाए
राम - सखा कोई खुद को कैसे इतना कर ले
जीवन तेरी - व्यथा कथा सब मुझसे सुन ले !!
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उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"

मंगलवार, 26 मई 2015

कैसी कैसी बातें ले हम बैठे



 कैसी कैसी बातें ले हम बैठे 
रात तन्हा थी कि दिन भी खो बैठे
मान ले ऐ दिल के राही हमसफ़र 
यूँ न तुम थे, यूँ न हम थे, कि था सहर l

ऐसी वैसी यादें ले क्यों बैठे 
चैन दिल का यूँ लुटा हम बैठे
रौशनी का दिया हम बुझा चल पड़े
देखने को सितारे कि अब हैं खड़े l

जैसे तैसे जिंदगी चलती रही
उठती गिरती और संभलती रही
संग कभी तन्हा कभी चलते रहें
इक जहर सा ये सफर है कि क्या कहें ?

कैसी कैसी बातें ले हम बैठे
छोटा सा ये सफर और हम बैठे 
आती जाती साँसों के ए रहगुज़र
यहाँ साथ पल का आ कि कर ले बसर ll


उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"
     २६/०५/२०१५
         मुंबई, १४:४०  

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

निःशब्दों की व्याकुलता

शब्दों की स्तब्धता 

निःशब्दों की व्याकुलता 
उफ़ 
जीवन की यह आकुलता 
चीत्कार या कि व्यवहारिकता ll

.......... उत्पल कांत मिश्र "नादाँ"

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

क्या माँगूँ मैं हाथ पसारी ?




उद्बुद्ध करते तिमिर प्रकाश में 
अनगिन वैचारिक श्रृंखलाएँ 
यह उद्वेलन शीतल जो कर दे
वह दैदीप्य कहाँ से लायें ll  

ज्ञान समंद में उबडुब अज्ञानी 
भँवर पार कर ओ अवहारी 
बिन गुरु ज्ञान होत  नहीं तारी  
कि  क्या  माँगूँ मैं हाथ पसारी ?

…… उत्पल कांत मिश्र "नादाँ"