शिव के मस्तक शव की धूली ये धरा श्मशान है / खेलो रे खेलो रंगों की होरी ये धरा श्मशान है ...!!
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शुक्रवार, 20 जुलाई 2018
बन्दे .... !!
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बुधवार, 18 जुलाई 2018
बुधवार, 28 दिसंबर 2016
मंगलवार, 26 जुलाई 2016
अरी बावरी नयना ताके
उत्पल कान्त मिश्र "नादां"
मुंबई
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शुक्रवार, 15 जनवरी 2016
जीवन - तृष्णा
जीवन तृष्णा उमड़ - घुमड़ मन पे बरसे
सत्व सिमट कर तन चेतन को हर ले
तृष्णा बन मृगतृष्णा री मुझको ही हर ले
जीवन तेरी - व्यथा कथा सब मुझसे सुन ले !!
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कैसा बीज धरा रे तुने इस घन बन में
मरीचिका बन ये मरुस्थल इसको हर ले
इंगला - पिंगला और कमल सब बंधन में ले
माया बन हंस कह मुझको खुद में ले ले !!
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मात्र भाव से हाथ पकड़ कंटक में छोड़े
पित्र भाव से कह संकट से तू युद्ध कर ले
मृदु भाव से सब अभाव सम्मुख भी कर दे
शनैः - शनैः इस बलशाली का बल सब ले ले !!
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किन्तु हा ! ये तृष्णा हर पल बढती जाए
सुरसा सा मुख खोले हनुमान हरती जाए
राम - सखा कोई खुद को कैसे इतना कर ले
जीवन तेरी - व्यथा कथा सब मुझसे सुन ले !!
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उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"
मंगलवार, 26 मई 2015
कैसी कैसी बातें ले हम बैठे
कैसी कैसी बातें ले हम बैठे
रात तन्हा थी कि दिन भी खो बैठे
मान ले ऐ दिल के राही हमसफ़र
यूँ न तुम थे, यूँ न हम थे, कि था सहर l
ऐसी वैसी यादें ले क्यों बैठे
चैन दिल का यूँ लुटा हम बैठे
रौशनी का दिया हम बुझा चल पड़े
देखने को सितारे कि अब हैं खड़े l
जैसे तैसे जिंदगी चलती रही
उठती गिरती और संभलती रही
संग कभी तन्हा कभी चलते रहें
इक जहर सा ये सफर है कि क्या कहें ?
कैसी कैसी बातें ले हम बैठे
छोटा सा ये सफर और हम बैठे
आती जाती साँसों के ए रहगुज़र
यहाँ साथ पल का आ कि कर ले बसर ll
उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"
२६/०५/२०१५
मुंबई, १४:४०
शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015
निःशब्दों की व्याकुलता
शब्दों की स्तब्धता
निःशब्दों की व्याकुलता
उफ़
जीवन की यह आकुलता
चीत्कार या कि व्यवहारिकता ll
.......... उत्पल कांत मिश्र "नादाँ"
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बुधवार, 22 अप्रैल 2015
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