बुधवार, 12 नवंबर 2014

नव जीवन प्रारूप





आज काफी अरसे के बाद अछाँदसिक कविता गहने की चेष्टा की है ! इस कविता के हर छंद का स्वरुप व प्रारूप भिन्न है ! आप पाठकों से नम्र  निवेदन है कि अपनी प्रतिक्रिया देकर अपने अनुभव से मुझे अवगत करायें ! प्राथनीय ……।

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले 
सुनकर ऐसी मीठी बातें, वह डोले है 
साँसों की यह कथा निराली, अंग हो ले !

साँझ सवेरे सपने देखे 
दिन अच्छे आएंगे रे 
लेकर बैठा पथरायी आँखें 
कथा सुनायी, अब सो ले रे ! 

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !

सूखे खेत, महाजन नाचे 
फटी रजाई, ओढ़ ले भाई 
राजा सब की भोज सजी है 
तू भूखी सो ले रे माई !

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !

परदेसी बेटा क्या बोले 
उसकी तो है अलग लड़ाई 
एक चाकरी के चक्कर में 
अपनी रोटी, जमीन गँवाई ! 

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !

प्रेम भाव सब उलझ गया है 
रिश्तों के अद्भुत गोले में 
समझ, समझ कर हम इतना हैं समझे 
गुम  हुए सारे सिरे उलझे गोले में !

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !

इन्सान कहाँ ? हम भीड़ हैं साहेब !
हाँकों लाठी से, न बने, तो मारो गोली  
महल बना लो हम लाशों की ढेरों पे 
मरघट के राजा बन, अरे तुम शान करो साहेब ! 

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !


थमा  हुआ है सारा जीवन गलियारों में  
देख निराली सत्ता की यह नयी लड़ाई 
बंधा पड़ा समाज यहाँ सरकारी कागज़ में 
जीवन अपना ! उठो, लड़ो और ले लो भाई !

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !


मजबूरी है, 
चाकरी है, 
घर की चिंता भी है,
कमजोरी की समझ बड़ी है 
ताकत उनकी बहुत बड़ी है 
इंसानों की फौज खड़ी  है 
हथियारों से धौंस जमी है 
जमीं - जमीर की लूट मची है  
जो सबका था अब उनका है  
हम समझ रहे थे, समझ रहे हैं 
मजबूरी है, इसकी अपनी भाषा है 
न गीत नया न बोल नए हैं 
हम पवन नहीं और पेड़ नहीं हैं !

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !

बदली थी. बदली है, बदलेगी धरती 
चक्रवात बन पवन पेड़ों को ले जाएगा 
वह आएगा, इक नल्हत  की आवाज़ उठेगी 
जय  भारती, जय  भारती, जय  भारती !

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
देख निराले खेल, चलो हम बहते हैं !!!!

उत्पल कांत मिश्र  "नादाँ"
१२.११. २०१४ 
१५:१६  

गुरुवार, 6 नवंबर 2014

मन कहीं और, तन कहीं और !!






मन  है कहीं और, कि तन कहीं और       
व्यथा नयी है क्या यह भाई ?
कि बंधन में  तो सब जकड़े हैं                    
भली  बंधन से  रीत निभायी !   

    
नदी चले तो  बंधन ना ले  
पक्षी उड़ें  तो मुक्त हो भाई !
पवन चले तो बंधन ले क्या?
कि तुमने  मरकर उमर बितायी!   

तुम कहे घुटता मैं बस मैं  हूँ 
दी ख़ुशी सबको ,कैसे भाई ?   
दुःख तेरा, ठीक,  जीवन क्या है?
रीत भली क्या कि अगन लगाई ? 


भला ऐसे हो, तब अच्छे हो
कि  मैं कहता हूँ, सुन लो भाई !
हाँ ! सुनी मैनें, तुम भी समझो  
कथा भली न जो चलती आयी  !

उत्पल कांत मिश्र "नादाँ " 
नवम्बर ६, २०१४;२३:२६ 

शुक्रवार, 6 जून 2014

अजी सोचिये क्या ग़जब हो गया है



अजी सोचिये क्या ग़जब हो गया है 
खुला आसमाँ था शहर हो   गया है ………………… !!

अजी सोचिये क्या ग़जब हो गया है 

बयारों की सरगम किरणों का छनना 
जँगल था जो सब महल हो गया है। ................ !!

अजी सोचिये क्या ग़जब हो गया है 

उसकी तुतली सी बोली मटकना ठुमकना 
वो नन्हा फरिश्ता आदमी हो गया है  ………… !!

अजी सोचिये क्या ग़जब हो गया है 

मुहल्ले की रौनक संग हँसना और गाना 
वो हिन्दू मुसलमाँ सा कुछ हो गया है …………… !!

अजी सोचिये क्या ग़जब हो गया है 

इन्सां थे आये जहाँ हो गया है 
कभी था ये अपना गुमाँ हो गया है ……… !!

अजी सोचिये क्या ग़जब हो गया है 

उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"
६ जून २०१४ 

शुक्रवार, 30 मई 2014

दग्ध





"दैदीप्यमान सूर्य" ! तुम्हें देखकर न जाने कितनों  के मानस पटल  पर  कितने प्रकार के विचार आविर्भूत होते होंगे I 

………… "मुंडे - मुंडे मतिर्भिनाः" I 

किन्तु एक बात अखंड है I जिसने भी तुम्हें देखा उसके मानस ने उससे कहा -
"शाक्ति " I  हाँ शक्ति  अभिव्यंजना ही  तो है तू I 

………… "अग्नि, दाह , पोषक , विनाशक  I "

किन्तु  "दैदीप्यमान सूर्य" !  जब भी मैनें तुम्हारी तरफ देखा ,  पता नहीं क्यूँ मुझे ऐसा लगा मानो एक अद्भुत , विलगित संकेत दे रहा है तू I  मानो  कह रहे हो मुझसे -

ऐ मानव ! 
क्या देखता है मेरी तरफ
किस निर्णय पे आना चाहता है  ?
उसपर,
जहाँ  अनेक मानव 
तुझसे पहले भी पहुंचे ?
किन्तु,
अर्द्ध सत्य है मात्र वह I 

हाँ ,
शक्तिशाली हूँ मैं 
अग्नि है मुझमें I 
भयभीत सब मुझसे
देखो I 
परिभ्रमण करते मेरे 
चहुँ दिश , निर्निमेष, निःशब्द 
यह समस्त ग्रह - समूह I 

हाँ !
शक्ति हूँ मैं 
परिक्रमा करते सब मेरी 
किन्तु,
दूर - दूर रह I 

इतनी दूर कि  मैं चाह  कर भी अपने अंतस का स्पंदन उन तक नहीं पहुँचा पाता I ऐ मानव ! कभी सोचा है , इतने अनुयाइयों के रहते हुए भी कितना अकेला हूँ मैं I  हाँ, आज मात्र एक अग्नि - पिंड बन कर रह गया हूँ मैं I 

मेरी यह शक्ति - मेरी अग्नि - मुझे कितनी तीव्रता से जला  रही है आज I 
शेष क्या मुझमें 
मात्र,
दहन I 

ऐ मानव ! 
काश.......
मेरे समीप आ 
कोई मुझसे कहे -
"ए  दैदीप्यमान सूर्य !
ऐ बंधु I 
बहुत जल चुका तू अकेला 
ला , अब बाँट लूँ  मैं 
तुझसे तेरा दाह  थोड़ा "I I 

ऐ मानव ! अब तू ही सोच , किस काम की मेरे मेरी यह शक्ति  ………… !!

उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ "
१९८६ 

बुधवार, 19 मार्च 2014

हमने पी है अभी है शराब बाकी





हमने पी है अभी है शराब बाकी 
होना क्या है हबीबों खराब बाकी …… !!

बादाकश (१)  हो उठाए सवाल ढेरों 
आना बस है हया का जबाब बाकी…… !!

लाया शीशा, मुसल्ला (२), कि साथ ए रब 
तेरा मेरा रहा ये हिसाब बाकी ……!!  

घमज़ाह (३), ज़ीनत (४), करिश्मा, यसार (५)  हैं 
जिस्म - ओ - जां सब, रहा क्या, तुराब (६) बाकी …!!

देखा सबने ख़जाना हिसाब करके 
मेरा बस है फ़टा इक जुराब बाकी …!!

यूं होता मैं कहानी जनाब प्यारी 
"नादाँ" होता, मगर है, सराब (७) बाकी …!! 

उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"
मार्च १९, २०१४ 
०२:५३ प्रातः  

(१) बादाकश: नशे में  धुत्त 
(२) मुसल्ला: नमाज़ पढ़ने की  चटाई  
(३) घमज़ाह: शोख़ी 
(४) ज़ीनत: खूबसूरती  
(५) यसार : ऐश्वर्य 
(६) तुराब: मिट्टी, धरती   
(७) सराब: भ्रम, मृगमरीचिका  

   

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

अरी बावरी नयना

(Pic From Google)


अरी बावरी नयना ताक़े 
काहे सपने मधुबन के ?
दिवा - रात्रि का शून्य काल है 
कैसे सपने चितवन के ?


अरी बावरी नयना ताक़े 
काहे सपने मधुबन के ?


भूख लगी , माँगूँ या छीनूँ 
क्षुधा सामरिक कैसी ये ?
कुसुम - लता में लवण कहाँ अब 
कैसा जीवन, जीवन है ये ?


अरी बावरी नयना ताक़े 
काहे सपने मधुबन के ?


तन पे कपड़ा, मन है नंगा 
लाशों पे होता झगड़ा ? 
बिखर गया सब कुछ अब तो भी 
है तो है, क्यों ये झगड़ा ?


अरी बावरी नयना ताक़े 
काहे सपने मधुबन के ?


घटा - घनेरी गरज - गरज बस 
बादल  बरस ही न पायें 
नीर नयन में  बसते इतने 
सावन पानी क्यों पायें ?


अरी बावरी नयना ताक़े 
काहे सपने मधुबन के ?
दिवा - रात्रि का शून्य काल है 
कैसे सपने चितवन के ?


उत्पल कान्त   मिश्र "नादाँ "




मंगलवार, 26 मार्च 2013

रंगरेज





ऐ रंगरेज 
आसमां में  इन्द्रधनुष की 
एक छवी सी देखी थी 
पुलकित मन फिर सोच रहा 
इन रंगों का क्या तू बाज़ीगर 
ऐ रंगरेज  !

देखो ! मुझमें भी हैं रंग 
पीत हुआ है मेरा बचपन 
जब माँ की लोरी सुनती हूँ 
और बाबू की  गोदी होती हूँ 
ऐ रंगरेज !

और है नीला मेरा अल्हड़पन 
जब मैं तितली सी उडती हूँ 
इत - उत दौड़ी भागी फिरती हूँ 
मैं दादी की नील परी  हूँ 
ऐ रंगरेज !

देख ! गुलाबी मेरा यौवन 
मैं खवाबों की अमराई हूँ 
उनकी आँखों को भायी  हूँ 
इस धरती की  लाल परी  हूँ 
ऐ रंगरेज !

ऐ रंगरेज 
पर मुझमें काला भी है 
जो तेरा धनुष  नहीं है 
इन बातों की बस पाती हूँ 
पर ये सब जीना चाहे हूँ 
ऐ रंगरेज !

ऐ रंगरेज 
हर लो ना मेरा कला रंग 
विनती कर मैं रोई हूँ 
मैं हरे को ललचाई  हूँ
दे दो ना ! मैं तेरे द्वारे आई हूँ 
ऐ रंगरेज !

ऐ रंगरेज 
बोलो ना .... !!
क्या जी लूं मैं फिर 
बचपन के वो बीते पल ?
ऐ रंगरेज ....... !!

........... उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ " 







रविवार, 22 जनवरी 2012

जीवन संग्राम







(Pic by my colleague Mr. Mahesh Singh)








हे रति !
एक बार पुनश्च
तुझको करना होगा त्याग विलाप
दग्धदेह, अरूप, चिरजीवित का संपोषण
सृजनशील लास्य से करना होगा

पिनाकिना का शक्ति उन्माद
नाग फणी सम करता निन्नाद
भाग्न्मनोरथा हो रही सती फिर
काम देव का निकट विनाश !

गर्वोन्मत्त शव का शिवं - हास
त्रिनेत्र किन्तु हा ! अंध भास
कामदेव के दग्ध पुष्प वाण
जाज्वल , विदेह फिर तेरा नाथ

शक्ति धरती है विद्रूप रूप
यही मही का सत्य रूप
तप - ताप, दग्ध मृदु करुण भाव
पशुपति में करो स्नेह - संचार

हे रति
गर्भित कर दो नृत्य प्रधान ............... !!

अरी मेनका
धर लो सोलह श्रिंगार भाव

निर्निमेष, हठधर्मी सम बैठा
चिदाकाश धारे विश्वामित्र अकेला
पृथ्वी की चिंता रेखाओं का
स्वर्ग लोग में हुआ वितान

हस्त कम्पन में वज्र हुआ
ऐरावत भी सहम रहा
शुक्र, गुरु स्तब्ध हुए
एक बार पुनश्च
भय का अवसान हुआ

री मेनका
याद तेरी अब आई
अरी वासना की व्याली
लास्य नृत्य मुद्रा वाली
रति मही पर सबको भायी

अहम्, शक्ति, भय, वासना
मोह, जीवन के आधार
भो - धरा श्मशान किया
सदियों से, क्या पाया ........... ??

रे मानव
अब तो बुद्ध बनो ............. !!!

उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"

सोमवार, 9 जनवरी 2012

अब्र ढल जाए है हरदम , यादों आया ना करो..... !!




(Pic From Google)












उम्र हो जायेगी दुस्तर वक़्त आने से पहले
शाख ढल जायेगी फूलों के सोने से पहले ………… !!

बंद हो जाये गर आंखें तो जानो बस ये तुम
कि चुप हो गयी हैं ये अब रोने से पहले ……………….. !!

अब्र ढल जाए है हरदम , यादों आया ना करो
कर लूं प्यार मैं तुझको फिर खोने से पहले ………… !!

क़त्ल मैने किया अबके, वो था अपना कब से
जश्न इक और हो यारों , खूँ धोने से पहले …………….. !!

ये ख़म – ओ – गुमाँ “नादाँ” लगते अच्छे कितनें
सब को यूँ लगा तेरे यां होने से पहले ………………….. !!

उत्पल कान्त मिश्र “नादाँ”