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सोमवार, 25 जनवरी 2016

तेरी कहानी .... तेरी जुबानी

आज एक कहानी कह रहा हूँ आप सबसे l इस कहानी की नायिका हम सबों के इर्द – गिर्द रहती है और हम रोजाना उसे देखते हैं, परखते हैं, पर समझते नहीं l विचित्र विडम्बना है, जो सामने है उसे हम समझते नहीं और जो अदृश्य है हम उसे जानने को कोशिश करते हैं l

इस कहानी के कथानक की न मैं कोई भूमिका कहूँगा न इस कथा का पटाक्षेप करूंगा l यह कथा चलती रही है और चलती रहेगी; उस दिन तक जबतक या तो हम “इंसानों” का हृदय विदीर्ण न हो जाए या फिर धरा अपनी छाती फाड़कर पुनः भूमिसुता का उद्धार न कर दे l

यह कथानक मुक्त है आपके अपने अनुभव के परिदृश्य में अपना ताना - बाना बुनने l यह अवश्य है की इस नायिका का कोई न कोई अंक आपने जरूर अनुभव किया है l आखिर यह नायिका हम सबों के इर्द – गिर्द ही तो है l

नायिका ने अपनी व्यथा – कथा एक “कमर्शियल प्रोजेक्ट” के लिए कही थी l वह तो हुआ नहीं, उसे होना भी नहीं था, सपनों के रंगीन चित्रपट्ट पर सच का एक मैला - कुचैला धब्बा ..... “हुँह” !


यदि इसे पढ़कर आपको लगता है कि यह नायिका आपके भाव को छूती है, आपसे साम्य रखती है  तो आपसे अनुरोध है कि आप इसे लाइक ना करें, अपितु इसे शेयर कर दें l कहीं यह नायिका किसी और के भाव को झंकृत कर सके शायद, कौन जाने !!    


पर्दा उठता है ........ नायिका प्रस्तुत है, अपने मैले - कुचैले दो टुकड़े चीथरे लपेट अपनी लाज को ढंकती l मेकअप और चमकीले वस्त्र लेने में असमर्थ हमारी यह नायिका क्षमा भी नहीं मांग सकेगी आपसे, उसे आता ही नहीं, कभी सीखने का अवसर नहीं मिला, किसी के पास सिखाने का वक़्त भी नहीं था l उफ्फ यह भागती, दौड़ती, होड़ लगाती जिंदगी !! मैं नायिका की तरफ़ से क्षमा प्रार्थी हूँ l सुनिए .....

(Pic Source: http://www.boston.com/bigpicture/2011/07/worlds_most_dangerous_countrie.html)

काली रातें काला दिन है
ये जीवन कैसा जीवन है
कब रोयी थी, कैसा दिन था
याद नहीं कब कोई अपना था ll
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मैं आयी तो, माँ तो होगी
कब कहाँ कैसी वो होगी
उस दिन वो भी रोयी होगी
गोद जब उसकी छीनी होगी ll

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जैसे तुम दीखते हो बाबू
वैसी ही दिखती हूँ मैं भी
फिर किस खोट से किस्मत फूटी?
इत – उत लुटती, हर दिन टूटी ll
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सडकें जिसको तुम कहते हो
वो मेरा अब दैर है भईया
ये ही चादर, ये ही तकिया
अँखियाँ सूखीं, सपना ना दरिया ll
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गाडी – मोटर चढ़ने वालों
एक नजर तो हमपर डालो
धूल सनी हूँ, पर इन्सां हूँ
अन्दर – बाहर बस एक खला हूँ ll
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हाथ – फैला कर, झोली लेकर
दो दाने ही तो मांगे थे
दिया ना एक निवाला तुमने
आस रही थी, छीना तुमने ll.
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कैसा रोग दिया ये तुमने
आग लगी है, दर्द बहुत है
खुद को इन्सां कहने वालों
आग तो दे देना इस तन को ll
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आग तो दे देना इस तन को ..............


उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"
मुंबई
२५.०१.२०१६   
   


बुधवार, 12 नवंबर 2014

नव जीवन प्रारूप





आज काफी अरसे के बाद अछाँदसिक कविता गहने की चेष्टा की है ! इस कविता के हर छंद का स्वरुप व प्रारूप भिन्न है ! आप पाठकों से नम्र  निवेदन है कि अपनी प्रतिक्रिया देकर अपने अनुभव से मुझे अवगत करायें ! प्राथनीय ……।

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले 
सुनकर ऐसी मीठी बातें, वह डोले है 
साँसों की यह कथा निराली, अंग हो ले !

साँझ सवेरे सपने देखे 
दिन अच्छे आएंगे रे 
लेकर बैठा पथरायी आँखें 
कथा सुनायी, अब सो ले रे ! 

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !

सूखे खेत, महाजन नाचे 
फटी रजाई, ओढ़ ले भाई 
राजा सब की भोज सजी है 
तू भूखी सो ले रे माई !

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !

परदेसी बेटा क्या बोले 
उसकी तो है अलग लड़ाई 
एक चाकरी के चक्कर में 
अपनी रोटी, जमीन गँवाई ! 

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !

प्रेम भाव सब उलझ गया है 
रिश्तों के अद्भुत गोले में 
समझ, समझ कर हम इतना हैं समझे 
गुम  हुए सारे सिरे उलझे गोले में !

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !

इन्सान कहाँ ? हम भीड़ हैं साहेब !
हाँकों लाठी से, न बने, तो मारो गोली  
महल बना लो हम लाशों की ढेरों पे 
मरघट के राजा बन, अरे तुम शान करो साहेब ! 

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !


थमा  हुआ है सारा जीवन गलियारों में  
देख निराली सत्ता की यह नयी लड़ाई 
बंधा पड़ा समाज यहाँ सरकारी कागज़ में 
जीवन अपना ! उठो, लड़ो और ले लो भाई !

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !


मजबूरी है, 
चाकरी है, 
घर की चिंता भी है,
कमजोरी की समझ बड़ी है 
ताकत उनकी बहुत बड़ी है 
इंसानों की फौज खड़ी  है 
हथियारों से धौंस जमी है 
जमीं - जमीर की लूट मची है  
जो सबका था अब उनका है  
हम समझ रहे थे, समझ रहे हैं 
मजबूरी है, इसकी अपनी भाषा है 
न गीत नया न बोल नए हैं 
हम पवन नहीं और पेड़ नहीं हैं !

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
बहना ही जीवन है भाई, संग हो ले !

बदली थी. बदली है, बदलेगी धरती 
चक्रवात बन पवन पेड़ों को ले जाएगा 
वह आएगा, इक नल्हत  की आवाज़ उठेगी 
जय  भारती, जय  भारती, जय  भारती !

हवा चले तो पेड़ों से क्या बोले है ?
देख निराले खेल, चलो हम बहते हैं !!!!

उत्पल कांत मिश्र  "नादाँ"
१२.११. २०१४ 
१५:१६  

गुरुवार, 6 नवंबर 2014

मन कहीं और, तन कहीं और !!






मन  है कहीं और, कि तन कहीं और       
व्यथा नयी है क्या यह भाई ?
कि बंधन में  तो सब जकड़े हैं                    
भली  बंधन से  रीत निभायी !   

    
नदी चले तो  बंधन ना ले  
पक्षी उड़ें  तो मुक्त हो भाई !
पवन चले तो बंधन ले क्या?
कि तुमने  मरकर उमर बितायी!   

तुम कहे घुटता मैं बस मैं  हूँ 
दी ख़ुशी सबको ,कैसे भाई ?   
दुःख तेरा, ठीक,  जीवन क्या है?
रीत भली क्या कि अगन लगाई ? 


भला ऐसे हो, तब अच्छे हो
कि  मैं कहता हूँ, सुन लो भाई !
हाँ ! सुनी मैनें, तुम भी समझो  
कथा भली न जो चलती आयी  !

उत्पल कांत मिश्र "नादाँ " 
नवम्बर ६, २०१४;२३:२६ 

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

युगांतर







(Pic Taken from hindudevotionalblg.com)













होगा क्या ....... ??
जलेगी एक और लंका
होगा एक और युद्ध
राम और रावण का !!

किन्तु, हा हंत ! इसमें
विजयी रावण होगा
क्योंकि इस युग में लोगो
विभीषण असत्य बोलेगा
नाभि के बदले वो
मस्तिष्क बोलेगा .......... !!

होगा क्या ....... ??
लिखी जायेगी एक और रामायण
कथा कुछ उल्टी होगी
किन्तु, इस युग में लोगो
हर भक्तों के द्वारा
यही रामायण पढ़ी जायेगी
होगा क्या ....... !!

उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"
मुंबई


शनिवार, 5 नवंबर 2011

श्रेष्ठ कौन ............... ?















कोई कहता धर्म प्रबल है
कोई कहता छल - प्रपंच
कहता हूँ मैं धर्म हीन
छल - प्रपंच संबल है ..................... !!

धर्म आधार देवगण भी
हैं छल - प्रपंच से विजयी हुए
यह पूछ महाभारत से
या फिर रामायण से ...................... !!

कहते हैं ये चीख - चीख
छल - प्रपंच किया था देवों नें
विजय देव की हुई नहीं
छल - प्रपंच विजय हुआ था ............ !!

कुरुक्षेत्र का मैदान यह देखो
कर्ण पडा था भूमि पर
था कहाँ धर्म, वो कहाँ थी नीति
था विवश कर्ण जब दलदल में ......... !!

पड़े थे भीष्म वाण - शय्या पर
सम्मुख शिखंडी था खडा
था अर्जुन का सर क्यों झुका हुआ
थी क्यों मुस्कान कृष्ण के होठों पर..... ??

खेल कृष्ण का था ये सारा
माया रची थी उसनें
कहो विजयी हुआ कौन था
कृष्ण या उसकी माया ........................ ??

पत्थर का यह सिन्धु - सेतु
कहता कथा पुराना है
हुआ राम - रावण युद्ध था
विजयी राम हुआ था ........................ !!

होड़ मची थी देवों में
वध रावण का करने को
फिरभी अडिग खड़ा था रावण
गिरा था भाई के धोखे से ................. !!

थे क्यों बिभीषण अश्रु में डूबे
थी क्यों मुस्कान राम के होठों पर
कहो विजयी हुआ कौन था
धर्म अथवा छल - प्रपंच ................... !!

हैं फिर कहते क्यों ये देव
धर्म की सदा जय है
"धर्म - धर्म" अरे ! धर्म क्या
इसके पीछे भी "माया" है ................. !!

हैं कहते जब इतिहास यही
वो छल से विजयी हुआ है
कहो फिर हुआ कौन प्रबल
धर्म अथवा छल - प्रपंच .................. ??

उत्पल कान्त मिश्र

(मेरी यह कविता किसी के धार्मिक व अध्यात्मिक विश्वास या परिधार्नाओं का अपमान करने हेतु नहीं है अपितु एक विशेष सार को इंगित करनें हेतु धार्मिक कथाओं के परिदृश्यों को आधार बना कर लिखी गयी एक कविता मात्र है. यहाँ ये मैं इस कर उधृत कर रहा हूँ, क्यों वर्षों पहले एक कवी सम्मलेन में जब मैनें इस कविता का पाठ किया था तो मेरे एक बहुत ही करीबी मित्र ने सलाह दी कि शायद इस काव्य के कुछ अंश कुछ वर्ग को अच्छे ना लगें. इसके बाद मैनें कवी सम्मेलनों में भाग लेना बंद कर दिया था और आज यह कविता मूल रूप में ही क्षमा सहित आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ. आपकी टिप्पणियों का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा।)

उत्पल कान्त मिश्र