बुधवार, 3 मई 2017

क्षणिका - हलफ़नामा

                                                                                       (Pic from http://pixabay.com)


इक हलफ़नामा मेरा भी
चिराग़ गुल हुआ था
जिस दिन, उस दिन
मैं बैठा था बुतखाने में
रोशन - ए - बाग़ - ए - इश्क़ रोज़
बैठा था मैं मयखाने में ... !! 

उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ" 
मुंबई 
अप्रैल १७, २०१७ 

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

मेरी नदी

                                                                                  (Pic from http://pixabay.com)



जीवन की उत्ताल तरंगें
बहती हरदम उठ – गिर करके
इस तट पर मैं मेरा बैठा
उस तट पर है निर्वाण खड़ा !!

यह तट है इह जीवन मेरा
है उस तट पर ये ध्यान टिका
भाव समंद की लहरों पर मैं
हूँ तरता नित इक नाव बना !!

कल – कल नदिया कहती मुझसे
मैल न दे तू मल सा मुझमें
पालन – तारण सब मैं तेरा
उस तट की नैया ये लहरें !!

जन – मन, संगी – साथी सारे
संग रहते हैं, बन से मन में
दूजा जाने! ये भंवर है
बसता तेरा राम सकल में !!

वह तट ही है तेरा जिसमें
पग ये हों तेरे धीर धरे
पीर पराई जाने जब तू
इस तट खुद तर आयेगा रे !!

इस तट खुद तर आयेगा रे !!

उत्पल कान्त मिश्र “नादां’”
मुंबई
जनवरी १०, २०१७

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

सूफ़ियाँ

(Pic from http://pixabay.com)



एक समंद है जीवन मेरा
लहरें बारम - बार !
उठना, गिरना, तरना, बहना
रुकना ना इस पार !! 

माई, अल्लाह, राम, श्याम
मौला, गुरुवर तेरा नाम ..... !! 


उत्पल कान्त मिश्र “नादां”
मुम्बई 
दिसम्बर २८, २०१६ 

(मेरे एक गीत का अंश) 

© Utpal Kant Mishra, 2016

मंगलवार, 25 अक्तूबर 2016

अकिंचन



जीवन के इन उपालंभों को 
हृद्भास ले मैं चलता हूँ l
इस जीवन की तुरीय संध्या
जब आएगी, मैं फिर आऊँगा l
हे पिता तुम्हारे चुम्बन को
मैं मधुर गात ये संग लाऊँगा ll


उत्पल कान्त मिश्र “नादां”
मुंबई
अक्टूबर २५, २०१६ 


(पुत्र  अथर्व को समर्पित !!) 




(Pic: Ramya Rao)

I am a Blogbuddy with Blogchatter.



सोमवार, 11 जुलाई 2016

अभिव्यन्जनाएं



दो शब्द ....
जीवन, मृत्यु 
मध्य समस्त
अभिव्यन्जनाएं
ज्ञात, अज्ञात
गद्य, पद्य ll



उत्पल कान्त मिश्र 
मुंबई 
११.०७.२०१६ 




सोमवार, 25 जनवरी 2016

तेरी कहानी .... तेरी जुबानी

आज एक कहानी कह रहा हूँ आप सबसे l इस कहानी की नायिका हम सबों के इर्द – गिर्द रहती है और हम रोजाना उसे देखते हैं, परखते हैं, पर समझते नहीं l विचित्र विडम्बना है, जो सामने है उसे हम समझते नहीं और जो अदृश्य है हम उसे जानने को कोशिश करते हैं l

इस कहानी के कथानक की न मैं कोई भूमिका कहूँगा न इस कथा का पटाक्षेप करूंगा l यह कथा चलती रही है और चलती रहेगी; उस दिन तक जबतक या तो हम “इंसानों” का हृदय विदीर्ण न हो जाए या फिर धरा अपनी छाती फाड़कर पुनः भूमिसुता का उद्धार न कर दे l

यह कथानक मुक्त है आपके अपने अनुभव के परिदृश्य में अपना ताना - बाना बुनने l यह अवश्य है की इस नायिका का कोई न कोई अंक आपने जरूर अनुभव किया है l आखिर यह नायिका हम सबों के इर्द – गिर्द ही तो है l

नायिका ने अपनी व्यथा – कथा एक “कमर्शियल प्रोजेक्ट” के लिए कही थी l वह तो हुआ नहीं, उसे होना भी नहीं था, सपनों के रंगीन चित्रपट्ट पर सच का एक मैला - कुचैला धब्बा ..... “हुँह” !


यदि इसे पढ़कर आपको लगता है कि यह नायिका आपके भाव को छूती है, आपसे साम्य रखती है  तो आपसे अनुरोध है कि आप इसे लाइक ना करें, अपितु इसे शेयर कर दें l कहीं यह नायिका किसी और के भाव को झंकृत कर सके शायद, कौन जाने !!    


पर्दा उठता है ........ नायिका प्रस्तुत है, अपने मैले - कुचैले दो टुकड़े चीथरे लपेट अपनी लाज को ढंकती l मेकअप और चमकीले वस्त्र लेने में असमर्थ हमारी यह नायिका क्षमा भी नहीं मांग सकेगी आपसे, उसे आता ही नहीं, कभी सीखने का अवसर नहीं मिला, किसी के पास सिखाने का वक़्त भी नहीं था l उफ्फ यह भागती, दौड़ती, होड़ लगाती जिंदगी !! मैं नायिका की तरफ़ से क्षमा प्रार्थी हूँ l सुनिए .....

(Pic Source: http://www.boston.com/bigpicture/2011/07/worlds_most_dangerous_countrie.html)

काली रातें काला दिन है
ये जीवन कैसा जीवन है
कब रोयी थी, कैसा दिन था
याद नहीं कब कोई अपना था ll
.
.
.
मैं आयी तो, माँ तो होगी
कब कहाँ कैसी वो होगी
उस दिन वो भी रोयी होगी
गोद जब उसकी छीनी होगी ll

.
.
.
जैसे तुम दीखते हो बाबू
वैसी ही दिखती हूँ मैं भी
फिर किस खोट से किस्मत फूटी?
इत – उत लुटती, हर दिन टूटी ll
.
.
.
सडकें जिसको तुम कहते हो
वो मेरा अब दैर है भईया
ये ही चादर, ये ही तकिया
अँखियाँ सूखीं, सपना ना दरिया ll
.
.
.
गाडी – मोटर चढ़ने वालों
एक नजर तो हमपर डालो
धूल सनी हूँ, पर इन्सां हूँ
अन्दर – बाहर बस एक खला हूँ ll
.
.
.
हाथ – फैला कर, झोली लेकर
दो दाने ही तो मांगे थे
दिया ना एक निवाला तुमने
आस रही थी, छीना तुमने ll.
.
.

कैसा रोग दिया ये तुमने
आग लगी है, दर्द बहुत है
खुद को इन्सां कहने वालों
आग तो दे देना इस तन को ll
.
.
.
आग तो दे देना इस तन को ..............


उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"
मुंबई
२५.०१.२०१६   
   


शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

जीवन - तृष्णा






जीवन तृष्णा उमड़ - घुमड़ मन पे बरसे

सत्व सिमट कर तन चेतन को हर ले
तृष्णा बन मृगतृष्णा री मुझको ही हर ले
जीवन तेरी - व्यथा कथा सब मुझसे सुन ले !!
.
.
. 
कैसा बीज धरा रे तुने इस घन बन में
मरीचिका बन ये मरुस्थल इसको हर ले 
इंगला - पिंगला और कमल सब बंधन में ले
माया बन हंस कह मुझको खुद में ले ले !!
.
.
. 
मात्र भाव से हाथ पकड़ कंटक में छोड़े 
पित्र भाव से कह संकट से तू युद्ध कर ले 
मृदु भाव से सब अभाव सम्मुख भी कर दे
शनैः - शनैः इस बलशाली का बल सब ले ले !!
.
.
. 
किन्तु हा ! ये तृष्णा हर पल बढती जाए
सुरसा सा मुख खोले हनुमान हरती जाए
राम - सखा कोई खुद को कैसे इतना कर ले
जीवन तेरी - व्यथा कथा सब मुझसे सुन ले !!
.
.
. 
उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"

मंगलवार, 26 मई 2015

कैसी कैसी बातें ले हम बैठे



 कैसी कैसी बातें ले हम बैठे 
रात तन्हा थी कि दिन भी खो बैठे
मान ले ऐ दिल के राही हमसफ़र 
यूँ न तुम थे, यूँ न हम थे, कि था सहर l

ऐसी वैसी यादें ले क्यों बैठे 
चैन दिल का यूँ लुटा हम बैठे
रौशनी का दिया हम बुझा चल पड़े
देखने को सितारे कि अब हैं खड़े l

जैसे तैसे जिंदगी चलती रही
उठती गिरती और संभलती रही
संग कभी तन्हा कभी चलते रहें
इक जहर सा ये सफर है कि क्या कहें ?

कैसी कैसी बातें ले हम बैठे
छोटा सा ये सफर और हम बैठे 
आती जाती साँसों के ए रहगुज़र
यहाँ साथ पल का आ कि कर ले बसर ll


उत्पल कान्त मिश्र "नादाँ"
     २६/०५/२०१५
         मुंबई, १४:४०